West Bengal में आज (सोमवार को) Assembly Election Result आने के बाद यह तय हो जाएगा कि सत्ता का ताज किसके सिर पर सजेगा। लेकिन चुनावी रिजल्ट घोषित होने से पहले बंगाल का सियासी इतिहास समझना बेहद अहम है, क्योंकि यहां पर सत्ता का संतुलन वक्त-वक्त पर बड़े बदलावों से गुजरा है।
1977 तक बंगाल में कांग्रेस का राज
स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दौर में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का दबदबा रहा था। यहां 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव से लेकर 1977 तक कांग्रेस ने सरकारें बनाईं और बंगाल की सियासत पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता और छोटे कार्यकाल वाली सरकारें भी इस दौरान पश्चिम बंगाल में देखने को मिलीं।
लेफ्ट ने लगातार 34 साल तक चलाई सरकार
इसके बाद, वर्ष 1977 में बड़ा परिवर्तन आया, जब CPIM के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार में आ गया। पहले ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य की लीडरशिप में लेफ्ट सरकार ने लगातार 34 वर्षों तक सरकार चलाई। यह देश के किसी भी राज्य में सबसे लंबा निर्वाचित शासन है।
जब TMC ने ध्वस्त किया लेफ्ट का किला
फिर 2011 में पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक और ऐतिहासिक मोड़ आया, जब ममता बनर्जी की पार्टी TMC ने लेफ्ट के किले को ध्वस्त कर दिया। ममता बनर्जी की लीडरशिप में TMC ने बंगाल में सत्ता संभाली और तब से लगातार यहां अपनी पकड़ बनाए हुए है।
BJP ने भी मजबूत किया अपना जनाधार
वहीं, पिछले कुछ वर्षों में BJP ने भी पश्चिम बंगाल में तेजी से अपनी जमीन मजबूत की है और यहां मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी है, जिससे टक्कर और दिलचस्प हो गई है।
पार्टीवार शासन का इतिहास
| पार्टी का नाम | कब से कब तक रही सरकार |
| कांग्रेस | 1952–1977 (बीच-बीच में अस्थिर सरकारें) |
| वाम मोर्चा (CPI(M) | 1977–2011 |
| तृणमूल कांग्रेस | 2011–वर्तमान |
अब नजरें आज पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों पर टिकी हुई हैं, जो तय करेंगे कि क्या Mamata Banerjee अपनी सरकार बरकरार रखेंगी या पश्चिम बंगाल में एक नया सियासी अध्याय शुरू होगा।